उत्तराखंड संस्कृत अकादमी एवं राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय जोशीमठ के संयुक्त तत्वावधान में ‘संस्कृत की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता’ विषय पर ऑनलाइन ई-संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें 50 से अधिक विद्वानों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं संस्कृत प्रेमियों ने ऑनलाइन माध्यम से प्रतिभाग किया।
उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा प्रदेश के प्रत्येक जनपद में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, संरक्षण, संवर्धन तथा वर्तमान संदर्भों में उसकी उपयोगिता को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से निरंतर इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी के तहत चमोली जनपद की यह ई-संगोष्ठी आयोजित की गई। इस महत्वपूर्ण पहल में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. विनय कुमार विद्यालंकार एवं शोध अधिकारी डॉ. हरीश गुरुरानी का विशेष योगदान एवं मार्गदर्शन रहा। अकादमी के इन्हीं प्रयासों से प्रदेश के विभिन्न जनपदों में संस्कृत को लेकर शैक्षिक एवं बौद्धिक संवाद को निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है।
कार्यक्रम में प्रो. सत्यप्रकाश द्विवेदी, जोधपुर विश्वविद्यालय ने संस्कृत की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता पर अपने विचार रखते हुए कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की भाषा नहीं है, बल्कि इसमें निहित साहित्य, दर्शन, विज्ञान, संस्कृति एवं जीवन-मूल्य आज के समय में भी अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक हैं। कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत को आधुनिक शिक्षा एवं तकनीकी माध्यमों से जोड़ते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
मनसा राम मैदुली, सहायक निदेशक, संस्कृत शिक्षा विभाग ने संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत को केवल धार्मिक भाषा के रूप में देखने के बजाय इसे भारतीय ज्ञान, चिंतन और संस्कृति की समृद्ध परंपरा के रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए सामूहिक प्रयासों पर बल दिया।
डॉ. कंचन तिवारी, साहित्य विभाग, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय ने संस्कृत साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में मानव जीवन, समाज, प्रकृति, नैतिकता और ज्ञान से संबंधित व्यापक चिंतन उपलब्ध है, जिसे वर्तमान सामाजिक एवं शैक्षिक संदर्भों में उपयोगी बनाया जा सकता है।
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय जोशीमठ के प्राचार्य प्रो. पंकज कुमार ने संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण आधारशिला बताते हुए कहा कि संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन की जिम्मेदारी केवल संस्कृत के विद्वानों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा प्रत्येक जनपद में आयोजित किए जा रहे ऐसे कार्यक्रमों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन संस्कृत को व्यापक समाज से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ई-संगोष्ठी के दौरान संस्कृत की शैक्षिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने संस्कृत को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने, युवा पीढ़ी में संस्कृत के प्रति रुचि उत्पन्न करने तथा डिजिटल माध्यमों के माध्यम से संस्कृत के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
कार्यक्रम में चमोली जनपद सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 50 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन सहभागिता की। विद्वानों एवं प्रतिभागियों के बीच संस्कृत की वर्तमान स्थिति, संभावनाओं और भविष्य की दिशा को लेकर सार्थक विचार-विमर्श हुआ।
इस अवसर पर आयोजकों ने उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. विद्याविनय अलंकार जी एवं शोध अधिकारी डॉ. हरीश गुरुरानी जी के मार्गदर्शन एवं सहयोग के लिए विशेष आभार व्यक्त किया।
ई-संगोष्ठी का उद्देश्य संस्कृत को केवल अतीत की भाषा के रूप में देखने के बजाय वर्तमान और भविष्य की ज्ञान-परंपरा से जोड़ना रहा, जिसके लिए उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा प्रदेश के प्रत्येक जनपद में किए जा रहे ऐसे प्रयास निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम हैं।